sundar kand pdf 2022 | सुंदरकांड पाठ हिंदी में pdf

सूंदर कांड पीडीऍफ़ इन हिंदी सूंदर कांड का पाठ हम अपने घर में विभिन अवसर पर करवाते है ताकि हमारे घर में शांति और भगवान जी का हमारे घर पर एक तरह से ध्यान या हाथ रहे  निचे पीडीऍफ़ का लिंक भी मिलेगी ताकि आप डाउनलोड कर सको

sundar kand pdf

सुंदरकांड

{ॐ श्री परमात्मनेनमः }
प्रनवउँपवनकु मार खल बन पावक ग्यानघन
जासुहृदय आगार बसह िं राम सर चाप धर
ककष्किन्धाकाण्ड सुन्दरकाण्ड
बहल बाँधत प्रभुबाढ़ेउ सो तनुबरहन न जाइ
उभय धरी म ँदीन्ही सात प्रदच्छिन धाई

अिंगद क ई जाऊँमैपारा
हजयँसिंसय कछुहिरती बारा
जामविंत क तुम सब लायक
पिई हकहम सबह कर नायक
क इ रीछपहत सुनु नुमाना
का चुप साहध र ेहु बलवाना
पवन तनय बल पवन समाना
बुच्छि हववेक हबग्यान हनधाना
कवन सो काज कहिन जग मा ीिं
जो नह िं ोइ तात तुम्ह पा ीिं
राम काज लहग तव अवतारा
सुनतह िं भयउ पबथताकारा
कनक बरन तन तेज हबराजा
मानहुँअपर हगरच्छन्ह कर राजा
हसिं नाद करर बारह िं बारा
लीलह िं नाघउँजलहनहध खारा
सह त स ाय रावनह मारी
आनउ इ ाँहिकु ट उपारर
जामविंत मैंप ँछउँतोह
उहचत हसखावनुदीजहु मो ी
एतना करहु तात तुम्ह जाई
सीतह देच्छख क हु सुहध आई
तब हनज भुज बल राहजवनैना
कौतुक लाहग सिंग कहप सेना

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छन्द
कहप सेन सिंग सिंघारी हनहसचर
रामुसीतह आहन ैं
हिलोक पावन सुजसुसुर मुहन
नारदाहद बखाहन ैं
जो सुनत गावत क त समुझत
परम पद नर पावई
रघुबीर पद पार्ोज मधुकर
दास तुलसी गावई
दोहा (सुन्दरकाण्ड)
भव भेषज रघुनार् जसुसुनह जेनर अरु नारर
हतन्ह कर सकल मनोरर् हसि करह िं हिहसरारर
नीलोत्पल तन स्याम काम कोहट सोभा अहधक
सुनेउ तासुगुन ग्राम जासुनाम अघ खग बहधक

 

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श्री गणेशाय नमः
श्रीरामचररत्रमानस सुन्दरकाांड श्लोक
शान्तिंशावतमप्रेमघनमघिं हनवाथणशाच्छन्तप्रदिं
ब्रह्माशमभुिणीन्द्रसेव्यमानीशिं वेदािंतहवघ हवभुम
रामाख्यिं जगदीस्वरम सुरगुरुिं मयमनुष्यम ररम
वन्दे िं करुणाकरिं रघुवरिं भ पालच डामहडम
नान्या स्पृ ा रघुपतेहृदयस्मदीये
सत्यम वदाहम च भवानच्छखलातरात्मा
भच्छि प्रत्यक्छ रघुपुङ्गव हनभथरािंमें
कामहददोषरह तिं कु रु मानसिंच
अतुहलतबलधामिं ेमशैलाभदे िं
दनुजवनकृ शानुिंज्ञाहननामग्रगण्यम
सकलगुणहनधानिं वनराणामधीशिं
रघुपहतहप्रयभििं वातजातिं नमाहम
जामविंत के बचन सु ाए
सुहन नुमिंत ह्रदय अहत भाए
तब लाहग मोह पररखेहु तुम्ह भाई
सह दुख किं द म ल िल खाई
जब लाहग आवौिंसीतह देखी
ोइह काजुमोह रष हवसेषी
य कह नाइ सबच्छन्ह कहुँमार्ा
चलेउ रहष ह यँधरर रघुनार्ा
हसिंधुतीर एक भ धर सुन्दर
कौतुक क हद चढ़ेउ ता ऊपर
बार बार रघुबीर सिंभारर
तरके उ पवनतनय बल भारी
जेह िं हगरर चरन देइ नुमिंता
चलेउ सो गा पाताल तुरिंता
हजहम अमोघ रघुपहत कर बाना
ए ीिंभाहतिंचलेउ नुमाना
जलहनहध रघुपहत द त हबचारी
तैंमैनाक ोह श्रम ारी
नुमान तेह परसा कर पुहन कीन्ह प्रणाम
राम काजुकीन्हेंहबनुमोह क ाँहवश्राम
जात पवनसुत देवन्ह देखा
जानैकहँबल बुच्छि हबसेषा
सुरसा नाम अह न्ह कैमाता
पिइच्छन्ह आई क ी तेह िं बाता
आजुसुरन्ह मोह दीन्ह अ ारा
सुनत वचन क पवन कु मारा
राम काजुकरर हिरर मैंआवौिं
सीता कई सुहध प्रभुह सुनावोिं
तब तव बदन पैहि उँआई
सत्य क उँमोह जान देमाई
कवनेउँजतन देई नह िं जाना
ग्रसहस न मोह क ेउ नुमाना
जोजन भरर तेह िं बदनुपसारा
कहप तनुकीन्ह दुगुन हबस्तारा
सोर जोजन मुख तेह िंियऊ
तुरत पवनसुत बहिस भयऊ
जस जस सुरसा बदनुबढ़ावा ।
तास द न कहप रूप हदखावा ।।
सत जोजन तेह िंआनन कीन ा ।
अहत लघुरूप पवनसुत लीन ा ।
बदन पईहि पुहन बा ेर आवा ।
मागा हबदा ताह हसरु नावा ।।
मोह सुरिं जेह लागी पिवा ।
बुच्छि बल मरम तोर मैपावा ।
[ दोहा २ ] (सुन्दरकाण्ड)

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राम काजुसबुकरर हु तुम्ह बल बुच्छि हनधान ।
आहसष देई गई सो , ररष चलेऊ नुमान ।।
हनहसचर एक हसिंधुम र ई ।
करर माया नभुके खग गई ।।
जीव जिंतुजेगगन उडाई ।
जल हबलोहक हतन्ह के परछाई ।।
ग ई छा िंसक सो न उडा ी ।
ऐह िं हवहध सदा गगनचर खाई ।।
सोई छल नुमान क कीिं ा ।
टास कपट कहप तुरन्तह िंचीन्हा ।।
ताह मारर मारूसुत बीरा ।
बाररहध पार गयऊ महतधीरा ।।
त ािं जाइ देखी बन शोभा ।
गुिंजत चिंचरीक मशुलोभा ।।
नाना तरु िल ि ल सु ाए ।
खग मृग बृिंद देच्छख मन भाए ।।
सैल हवशाल देच्छख एक आगें।
ता पर धाई चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछुकहप के अहधकाई ।
प्रभुप्रताप जो कालह खाई ।।
हगरर पर चहढ लिंका तेह देच्छख ।
क ीिंन जाई अहत दुगथहबसेषी ।।
अहत उतिंग जलहनधी चहुिं पासा ।
कनक कोट कर परम प्रकासा ।।
।। छां द ।। (सुन्दरकाण्ड)
कनक कोट हवहचि महन कृ त सुन्दरयातना घना ।
चहुिं ट्ट ट्ट सुबट्ट बीिंर्ी चारु पुर बहु हवहध बना ।।
गज बाहज खच्चर हनकर पदचर रर् बरूर्ह िं को गनै।
बहुरूप हनहसचर ज र् अहतबल सेन बरनत न ीिंबनै।। १ ।।
बन बाग उपवन वाहटका सर क िं प बापी सो ह िं ।
नर नाग सुर गिंधवथकन्या रूप मुहन मन मो ह िं ।।
कहुँमाल दे हवशाल सैल समान अहतबल गरज ीिं।
नाना आखरें हभरह िं बहुहवहध एक एकन्ह तजथ ीिं।। २।।
करर जतन भट कोहटन्ह हबकट तन नगर चहुिं हदहस रक्ष ीिं।
कहुँमह ष मानुष धेनुखर अज खल हनशाचर भछ्छ ीिं।।
ऐह लाहग तुलसीदास इन्ह की कर्ा कछुएक ैक ीिं।
रघुबीर सर तीरर् सरीरह िं त्याहग गहत पै ह िं स ी ।। ३ ।।
[ दोहा – ३ ] (सुन्दरकाण्ड)

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पुर रखवावेदेच्छख बहु , कहप मन कीन हवचार ।
अहत लघुरूप धरोिंहनहस नगर करौिंपइसार ।।
मसक समान रूप कहप धरी ।
लिंकह चलेउ सुमुरर नर री ।।
नाम लिंहकनी एक हनशचरी ।
सो क चलेसी मोह हनिंदरी ।।
जानेह न ीिंमरमुसि मोरा ।
मोर अ ार ज ािं लहग चोरा ।।
मुिीका एक म ा कहप नी ।
रुहधर बमत धरनी िनमनी ।।
पुहन सिंभारी उिी सो लिंका ।
जोरी पाहन कर हवनय ससिंका ।।
जब रावनह ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत हबरिंची करर मोह चीन्हा ।।
हबकल ोहस तेंकहप केंमारे।
तब जानेसुनीहसचर सिंघारे।।
तात मोर अहत पुण्य बहता ।
देखेउँनयन राम कर द ता ।।
[ दोहा ४ ] (सुन्दरकाण्ड)

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तात स्वगथअपबगथसुख , धरेउ तुला एक अिंग ।
त ल न ताह सकल हमहल , जो सुख लव सतसिंग ।।
प्रबहस नगर कीजेसब काजा ।
ह्रदय राखी कोसलपुर राजा ।।
गरल सुधा ररपुकरह हमताई ।
गोपद हसिंधुअनल हसतलाई ।।
गरुण समेरू रेनुसम ता ी ।
राम कृ पा करर हचतवा जा ीिं।।
अहत लघुरूप धरेउ नुमाना ।
पेिा नगर सुहमरर भगवाना ।।
मिंहदर मिंहदर प्रहत करर सोधा ।
देखेंज त अहगनत जोधा ।।
गयउ दशानन मिंहदर मा ीिं।
अहत हवहचि क ीिंजात सो ना ीिं।।
सयन हकएँदेखा कहप तेह ।
मिंहदर महुिं न दीच्छख बैदे ी ।।
भवन एक पुहन दीख सु ावा ।
रर मिंहदर त हभन्न बनावा ।।
[ दो ा ५ ] (सुन्दरकाण्ड)

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रामायुि अिंहकत गृ सोभा बरहन ना जाई ।
नव तुलहसका बृिंद त ँदेच्छख षथकहपराई ।।
लिंका हनहसचर हनकर हनवासा ।
इ ाँक ािं सज्ज्जन कर बासा ।।
मन महुँतरक करैंकहप लागा ।
तेह समय हवभीषनुजागा ।।
राम राम तेह िं सुहमरन कीन्हािं ।
ह्रदयँ षथकहप सज्जन चीन ा ।।
एह सन हि करर ऊँपह चानी ।
साधुसे ोई न कारज ानी ।।
हबप्र रूप धरर बचन सुनाए ।
सुनत हवभीषण उिी त ँआए ।।
करर प्रणाम प ँछी कु सलाई ।
हबप्र क हु हनज कर्ा बुझाई ।।
की तुम्ह रर दासन्ह मेंकोई ।
मोरेंहृदय प्रीहत अहत ोई ।।
की तुम्ह रामुदीन अनुरागी ।
आयाहु मोह करन बड भागी ।।
[ दो ा ६ ] (सुन्दरकाण्ड)

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तब नुमिंत क ीिंसब , राम कर्ा हनज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन , मगन सुमरी गुन ग्राम ।।
सुनहु पवनसुत रह नी मारी ।
हजहम दसनच्छन्ह महुँजीभ हबचारी ।।
तात कबहुँमोह जाहन अनार्ा ।
कररह ह िं कृ पा भानुकु ल नार्ा ।।
तामस तनुकछुसाधन ना ीिं।
प्रीहत न पद सरोज मन मा ीिं।।
अब मोह भा भरोस नुमिंता ।
हबनु ररकृ पा हमलह िं न ीिंसिंता ।।
जौिंरघुबीर अनुग्र कीन ा ।
तौ तुम दरस मोह िी दीन्हा ।।
सुनह हवभीषण प्रभुकै रीहत ।
करह िं सदा सेवक पर प्रीहत ।।
क हुिं कवन मैपरम कु लीना ।
कहप चिंचल सब ीिंहवहध ीना ।।
प्रात लेइ जो नाम मारा ।
तेह हदन ताह न हमलैअ ारा ।।
[ दो ा ७ ] (सुन्दरकाण्ड)

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अस मैंअधम सखा सुनुमोह पर रघुबीर ।
कीन ी कृ पा स हमरी गुन भरेहबलोचन नीर ।।
जानतहिं अस स्वामी हबसारी ।
हिरह िं तेका ेन ोह िं दुखारी ।।
ऐह िं हवहध क त राम गुन ग्रामा ।
पावा अहनबाथच्य हबश्रामा ।।
पुहन सब कर्ा हबहभषण क ीिं।
जेह हवहध जनकसुता त ँर ी ।।
तब नुमिंत क ा सुन भ्राता ।
देखी च उँजानकी माता ।।
जुगुती हवभीषण सकल सुनाई ।
चलेउ पवनसुत हबदा कराई ।।
करर सोई रूप गयउ पुहन त वाँ।
बन अशोक सीता र ज वाँ।।
देच्छख मच्छन्हिंमहुँकीन्ह प्रनामा ।
बैहिह िं बीहत जात हनहस जामा ।।
कृ स तनुसीस जटा एक बेनी ।
जपहत ह्यदयँरघुपहत गुन श्रेणी ।।
[ दो ा ८ ] (सुन्दरकाण्ड)

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हनज पद नयन हदएँपद राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देच्छख जानकी दीन ।।
तरु पल्लव महुँर ा लुकाई ।
करई हवचार कारौिंका भाई ।।
तेह अवसर रावनुत ँआवा ।
सिंग नारी बहु हकएँबनावा ।।
बहु हवहध खल सीतह समुझावा ।
साम दान भय भेद देखावा ।।
क रावनुसुनुसुमुच्छख सयानी ।
मिंदोदरी आहद सब रानी ।।
तव अनुचरी करउँपन मोरा ।
एक बार बीलोहक मन ओरा ।।
तृन धरर ओट क हत बैदे ी ।
सुहमरर अवधपती परम सने ी ।।
सुनुदशमुख खघोत प्रकाशा ।
कबहुँहक नहलनी करई हबकासा ।।
अस मन समझुक हत जानकी ।
खल सुहध न ीिंरघुबीर बानकी ।।
सि सुने रर आने ी मो ी ।
अधम हनलज्ज लाज न ीिंतो ी ।।
[ दो ा ९ ] (सुन्दरकाण्ड)

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आपुह सुहन खघोत सम , रामह भानुसमान ।
पुरुष वचन सुहन काढी अहस ,बोला अहत च्छखसीअाान ।।
सीता तैंमम कृ त अपमाना ।
कहट उँतव हसर कहिन कृ पाना ।।
नाह िं त सपहद मानुमम बानी ।
स मुच्छख ोहत न त जीवन ानी ।।
स्याम सरोज दाम सम सुिंदर ।
प्रभुभुज करर कर सम दसकिं धर ।।
सो भुज किं ि हक तव अहस घोरा ।
सुनुसि अस प्रवान पन मोरा ।।
चिंद्र ास रु मम पररतापिं ।
रघुपहत हबर अनल सिंतापिं ।।
सीतल हनहसत ब हस बर धारा ।
क सीता रु मम दुख भारा ।।
सुनत वचन पुहन मारन धावा ।
मयतनयाँकह नीहत बुझावा ।।
क ेहस सकल हनहसचरह िं बोलाई ।
सीतह बहु हवहध िासहु जाई ।।
मास हदवस महुँक ा न माना ।
तौ मैमाररबी काढी कृ पाना ।।
[ दो ा – १० ] (सुन्दरकाण्ड)

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भवन गयउ दसकिं धर इन्हा हपसहचनी बृन्द ।
सीताह िास देखावह िं , धरह रूप बहु मिंद ।।
हिजटा नाम राक्षसी एका ।
राम चरन रहत हनपुण हबबेका ।।
सबन्हौ बोहल सुनाएसी सपना ।
सीतह सेई करहु ह त अपना ।।
सपनेंवानर लिंका जारी ।
जातुधान सेना सब मारी ।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा ।
मुिंहडत हसर खिंहडत भुज बीसा ।।
एह हवहध सो दछ्छहन हदहस जाई ।
लिंका मनुहुँहवभीषण पाई ।।
नगर हिरी रघुबीर दो ायी ।
तब प्रभुसीता बोहल पिाई ।।
य सपना मैंक उँपुकारी ।
ोइह सत्य गएँहदन चारी ।।
तासुवचन सुहन तेंसब डरीिं।
जनकसुतािं के चरनह िं परीिं।।
[ दो ा ११ ] (सुन्दरकाण्ड)

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ज ँत ँगईिंसकल तब ,सीता कर मन सोच ।
मास हदवस बीतेंमोह , मरर ी हनहसचर पोच ।।
हिजटा सन बोलीिंकर जोरी ।
मातुहवपहि सिंगहन तैंमोरी ।।
तजौिंदे करु बेहग उपाई ।
दुस हबरहु अब नह िं सह जाई ।।
आहन काि रचुहचता बनाई ।
मातुअनल पुहन देह लगाई ।।
सत्य कररह मम प्रीहत सयानी ।
सुनैको श्रवन स ल सम बानी ।।
सुनत वचन पद गह समुझाएहस ।
प्रभुप्रताप बल सुजसुसनाएहस ।।
नीहस न अनल हमल सुन सुकु मारी ।
अस क ी सो हनज भवन हसधारी ।।
क सीता हवहध भा प्रहतक ला ।
हमहल ी न पावक हमहत ी न स ला ।।
देच्छखयत प्रकट गगन अिंगारा ।
अवहन न आवत एकउ तारा ।।
पावकमय सहस स्त्रव न आगी ।
मानहुँमोह जाहन तभागी ।।
सुनह हवनय मम हबपट अशोका ।
सत्य नाम करु रु मम सोका ।।
न तन हकसलय अनल समाना ।
देह अहि जहन क करह हनदाना ।।
देच्छख परम हबर ाकु ल सीता ।
सो छन कहप ी कलप सम बीता ।।
[ दोहा १२ ] (सुन्दरकाण्ड)

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कहप करर हृदयँहबचार दीन्हीिंमुहद्रका डारी तब ।
जनुअशोक अिंगार दीन्ह रहष उहि कर ग ेउ ।।
तब देखी मुहद्रका मनो र ।
राम नाम अिंहकत अहत सुिंदर ।।
चहकत हचतव मुदरी प चानी ।
षथहवषाद हृदय अकु लानी ।।
जीहत को सकई अजय रघुराई ।
माया तेंअहस रहच न ीिंजाई ।।
सीता मन हबचार कर नाना ।
मधुर वचन बोलेउ नुमाना ।।
रामचिंद्र गुन बरनैलागा ।
सुनतह िं सीता कर दुख भागा ।।
लािंगी सुनैश्रवन मन लाई ।
आहदहु तेंसब कर्ा सुनाई ।।
श्रवनामृत जेह िं कर्ा सु ाई ।
क ी सो प्रकट ोती हकन भाई ।।
तब नुमिंत हनकट चहल गयउ ।
हिर बैिीिंमन हबसमय भयउ ।।
राम द त मैमातुजानकी ।
सत्य सपर् करूणाहनधान की ।।
य मुहद्रका मातुमैंआनी ।
दीन्हीिंराम तुम्ह क ँसह दानी ।।
नर बानरह सिंग कहु कै से।
क ी कर्ा भई सिंगहत जैसें।।
[ दोहा १३ ] (सुन्दरकाण्ड)

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कहप के बचन सप्रेम सुहन, उपजा मन हवस्वास ।
जाना मन क्रम बचन य , कृ पा हसिंधुकर दास ।।
ररजन जाहन प्रीहत अहत गाढ़ी ।
सजल नयन पुलकावहल बाढी ।।
ब डत हबर जलहध नुमाना ।
भयउ तात मो कहुँजलजाना ।।
अब कहुँकु सल जाउँबहल ारी ।
अनुज सह त सुख भवन खरारी ।।
कोमलहचत कृ पाल रघ राई ।
कहप के ह ेतुधरी हनिु राई ।।
स ज बाहन सेवक सुखदायक ।
कबहुिंक सुरहत करत रघुनायक ।।
कबहुँनयन मम सीतल ताता ।
ोईह िं हनरच्छख स्याम मृदुगाता ।।
बचनुन आव नयन भरेबारी ।
अ नार् ौ हनपट हबसारी ।।
देच्छख परम हबर ाकु ल सीता ।
बोला कहप मृदुवचन हबनीता ।।
मातुकु सल प्रभुअनुज समेता ।
तव दुख दुखी सुकृ पा हनके ता ।।
जहन जननी मानहु हजयँऊना ।
तुम्ह तेप्रेमुराम के द ना ।।
[ दोहा १४ ] (सुन्दरकाण्ड)

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रघुपहत कर सिंदेसुअब , सुनुजननी धरर धीर ।
अस कह कहप गदगद भयउ भरेहबलोचन नीर ।।
क ेउ राम हबयोग तब सीता ।
मो कहुिं सकल भय हवपरीता ।।
नव तरु हकसलय मनहुँकृ सानु।
कालहनसा सम हनहस सहस भान ।।
कु बलय हबहपन कुिं तबन सररसा ।
बाररद तपत तेल जनुबररसा ।।
जेह त र ैकरत तेई पीरा ।
उरग स्वास सम हिहबहध समीरा ।।
क हँतेकछुदुख घहट ोई ।
काह क ौिंय जान न कोई ।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ।
जानत हप्रया एकुमनुमोरा ।।
सो मनुसदा र त तोह िं पा ीिं।
जानुप्रीहत रसुएतने ी मा ीिं।।
प्रभुसिंदेसुसुनत बैदे ी ।
मगन प्रेम तन सुहध नह िं ते ी ।।
क कहप हृदय धीर धरूमाता ।
सुहमरू राम सेवक सुखदाता ।।
उर आनह रघुपहत प्रभ ताई ।
सुहन मम बचन तजहु कहदराई ।।
[ दोहा १५ ] (सुन्दरकाण्ड)

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हनहसचर हनकर पतिंग सम रघुपहत बान कृ सानु।
जननी हृदय धीर धरू जरेहनशाचर जानु।।
जौिंरघुबीर ोहत सुहध पाई ।
करतेन ीिंहबलिंबुरघ राई ।।
राम बान रहब उएँजानकी ।
तम बरूर् क जात धान की ।।
अबह िंमातुमैंजाउँलवाई ।
प्रभुआयसुन ीिंराम दो ाई ।।
कछु क हदवस जननी धरू धीरा ।
कहपन्ह सह त अइह िं रघुबीरा ।।
हनहसचर मारर तो ी लैजे ह िं ।
हतन्हह पुर नारदाहद जसुगै ह िं ।।
ै सुत कहप सब तुम्हह िं समाना ।
जातुधान अहत भट बलवाना ।।
मोरेंहृदय मरम सिंदे ा ।
सुहन कहप प्रगट कीन हनज दे ा ।।
कनक भ दराकार सरीरा ।
समर भयिंकर अहत बलबीरा ।।
सीता मन भरोस तब भयउ ।
पुहन लघुरुप पवनसुत लयउ ।।
[ दोहा १६ ] (सुन्दरकाण्ड)

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सुनुमाता साखा मृग , न ीिंबल बुच्छि हबशाल ।
प्रभुप्रताप तेंगरुणह िं खाई परम लघुब्याल ।।
मन सिंतोष सुनत कहप बानी ।
भगहत प्रताप तेज बल सानी ।।
आहसश दीन्ह रामहप्रय जाना ।
ोह तात बल सील हनधाना ।।
अजर अमर गुनहनहध सुत ोह ।
करहिं बहुत रघुनायक छोहिं ।।
करह कृ पा प्रभुअस सुहन काना ।
हनभथर प्रेम मगन नुमाना।।
बार बार नाएहस पद सीसा ।
बोला वचन जोरी कर कीसा ।।
अब कृ तकृ त्य भयउ मैंमाता ।
अााहसष तव अमोघ हवख्याता ।।
सुन्हहु मातुमोह अहतसय भ खा ।
लागी देच्छख सुिंदर िल रूखा ।।
सुनुसुत करह िं हवहपन रखबारी ।
परम सुभट रचनीचर भारी ।।
हतन्ह कर भय माता मोह नाह िं ।
जौिंतुम्ह सुख मानह मन मा ीिं।।
[ दोहा १७ ] (सुन्दरकाण्ड)

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देच्छख बुच्छि बल हनपुन कहप क उ जानकी जाहु ।
रघुपहत चरन हृदय धरर तात मधुर िल खाहु ।।
चलेउ नाइ सुरु पैिे उ बागा ।
िल खाएहस तरु तोरैंलागा ।।
र ेत ािं बहु भट रखवारे।
कछुमारेहस कछुजाए पुकारे।।
नार् एक आवा कहप भारी ।
तेह अशोक वाहटका उजारी ।।
खाएहस िल अरु हवटप उपारे।
रक्छक महदथमहदथम ी डारे।।
सुहन रावन पिे ए भट नाना ।
हतन्हह देच्छख गजेउ नुमाना ।।
सब रचनीचर कहप शिंघारे।
गए पुकारत कछुअधमारे।।
पुहन पियउ तेह िं अक्षय कु मारा ।
चला सिंग लैसुभट अपारा ।।
आवत देच्छख हवटप गह तजाथ।
ताह हनपाती म ाधुहन गजाथ।।
[ दोहा १८ ](सुन्दरकाण्ड)

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कछुमारेसी कछुमदेहस कछुहमलेएहस धरर ध री ।
कछुपुहन जाइ पुकारेप्रभुमरकट बल भ रर ।।
सुहन सुत बध लिंके श ररसाना ।
पिएहस मेघनाद बलवाना ।।
मारहस जहन सुत बाधेसुताह ।
देच्छखउ काहप ी क ािं कर आह िं ।।
चला इिंद्रजीत अतुहलत जोधा ।
बिंधुहनधन सुहन उपजा क्रोधा ।।
कहप देखा दारुन भट आवा ।
कटकटाई गरजा अरु धावा ।।
अहत हवशाल तरु एक उपारा ।
हबरर् कीन लिंके श कु मारा ।।
र ेम ाभट ताके सिंगा ।
गह गह कहप मदथई हनज अिंगा ।।
हतनच्छन्हिं नीपाती ताह सन बाजा ।
हभरेजुगल मानहुँगजराजा ।।
मुहिका मारर चढ़ा तरु जाई ।
ताह एक छन मुरुछा आई।।
उिी ब ोरी कीिंच्छन्हहस बहु माया ।
जीती न जाइ प्रभिंजन जाया ।।
[ दोहा १९ ] (सुन्दरकाण्ड)

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ब्रह्म अस्त्र तेह िं साधा , कहप मन कीन हवचार ।
जौिंन ब्रह्मसर मानउँमह मा हमटइ अपार ।।
ब्रह्मबान कहप कहुँतेह मारा ।
पररतहुँबार कटक सिंघारा ।।
तेह देखा कहप म हछथ त भयउ ।
नागपास बाँधेहस लैगयउ ।।
जासुनाम जहप सुनहु भवानी ।
भव बिंधन काटह िं नर ग्यानी ।।
तासुद त हक बिंध तरु आवा ।
प्रभुकारज लगी कपह िं बिंधावा ।।
कहप बिंधन सुहन हनसीचर धाए ।
कौतुक लागी सभाँसब आए ।।
दसमुख सभा हदखी कहप जाई ।
क ी न जाई कछुअहत प्रभुताई ।।
कर जोरेंसुर हदहसप हवनीता ।
भृकु हट हबलोकत सकल सभीता ।।
देच्छख प्रताप न कहप मन सिंका ।
हजहम अह गन महु गरुण असिंका ।।
[ दो ा २० ] (सुन्दरकाण्ड)

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कपी ी हबलॉकी दशानन हब सा क ी दुरबाद ।
सुत बध सुरहत कीन पुहन उपजा हृदय हवषाद ।।
क लिंके श कवन तै कीसा ।
के ी के बल घाले ी बन खीसा ।।
की धौिंश्रवण सुने ी न ीिंमोह ।
देखउँअहत असिंक सि तो ी ।।
मारेहनहसचर के ी अपराधा ।
कह सि तो ी न प्रान कहिं बाधा ।।
स न रावन ब्रह्मािंड हनकाया ।
पाई जासुबल हबरिंहचत माया ।।
जाकेंबल हबरिंची र ईसा ।
पालत सृजत रत दशसीसा ।।
जा बल सीस धरत स सानन ।
अिंडकोष समेत हगररकानन ।।
धरई जो हबहबध दे सुरिाता ।
तुम्ह सेसिन हसखावनुदाता ।।
र को दिंड कहिन जेह भिंजा ।
तेह समेत नृप दल मद गिंजा ।।
खर द षन हिहसरा अरु बाली ।
बधेसकल अतुहलत बलशाली ।।
[ दोहा २१ ] (सुन्दरकाण्ड)

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जाके बल लवलेंस तें, हजतेह चराचर झारी ।
ताशुद त मैजा करर , रर आनेह हप्रय नारी ।।
जानउँमैंतुम्हारी प्रभुताई ।
स सबाह सन परी लराई ।।
समर बाहल सन करर जसुपावा ।
सुहन कहप वचन हब हस हब रावा ।।
खायउँिल प्रभुलागी भ ँखा ।
कहप सुभाय तेंतोरैंरूखा ।।
सब के दे परम हप्रय स्वामी ।
मारह िंमोरी कु मारग गामी ।।
हजन्ह मोह मारा तेंमैंमारे।
तेह पर बाधेउँतनय तुम्हारे।।
मोह न कछुबािंधेकई लाजा ।
कीन च हुँहनज प्रभुकर काजा ।।
हबनती करउँजोरी कर रावण ।
सुजहु मान तजी मोर हसखावन ।।
देखहु तुम हनज कु लह हबचारी ।
भ्रम ताजी भजहु भगत भय ारी ।।
जाके डर अहत काल डेराई ।
जो सुर असुर चराचर खाई ।।
तासोिंबयरू कबहुँन ीिंकीजे।
मोरेक ेजानकी दीजै।।
[ दोहा २२ ] (सुन्दरकाण्ड)

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प्रनतपाल रघुनायक करुणा हसिंधुखरारर ।
गएँसरन प्रभुराख ैंतव अपराध हबसारर ।।
राम चरन पिंकज उर धरह ।
लिंका अचल राजुतुम्ह करह ।।
ररषी पुलच्छस्त जसुहबमल मयिंका ।
तेह सहस महुिं जहन ोहिं कलिंका ।।
राम नाम हबनुहगरा न सो ा ।
देखुहबचारी त्यागी मद मो ा ।।
बसन ीन न ीिंसो सुरारी ।
सब भ षण भ हषत बर नारी ।।
राम हबमुख सिंपहि प्रभुताई ।
जाई र ी पाई हबनुपाई ।।
सजल म ल हजन्ह सररतन्ह ना ीिं।
बरहष गएँपुहन तबह िं सुखा ी ।।
स नुदसकिं ि क उँपन रोपी ।
हवमुख राम िाता न ीिंकोपी ।।
सिंकर स स हबष्नुअज़ तो ी ।
सकह िं न राच्छख राम कर द्रो ी ।।
[ दोहा  २३ ] सुंदरकांड ]

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मो म ल बहु स ल प्रद त्यागहु तम अहभमान ।
भजहु राम रघुनायक कृ पा हसिंधुभगवान ।।
जदहप क ी कहप अहत ह त बानी ।
भगहत हबबेक हबरहत नय सानी ।।
बोला हब हस म ा अहभमानी ।
हमला म ी कहप गुर बड ग्यानी ।।
मृत्युहनकट आई खल तो ी ।
लागेसी अधम हसखावान मो ी ।।
उलटा ोह क नुमाना ।
महतभ्रम तौर प्रकट मैजाना ।।
सुहन कहप वचन बहुत च्छखहसयाना ।
बेगी न रहु म ढ़ कर प्राना ।।
सुनत हनशाचर मारन धाएिं ।
सहचवन्ह सह त हवभीषनुआए ।।
नाई सीस करर हवनय बहता ।
नीहत हवरोध न माररअ द ता ।।
आन दिंड कछुकररअ गोसाईिं ।
सब ीिंक ा मिंि भल भाई ।।
सुनत हब सी बोला दसकिं धर ।
अिंग भिंग कर पहिइअ बिंदर ।।
[doha   २४ ] सुंदरकांड ]  

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कहप के ममता प िंछ पर सबह क उँसमुझाई ।
तेल बोरी पट बािंधी पुहन पावक देहु लगाई ।।
प िंछ ीन बानर त ँजाइह ।
तब सि हनज नार्ह लई आइह ।।
हजन्ह कै कीनह हस बहुत बडाई ।
देखउँमैंहतन्ह कै प्रभुताई ।।
बचन सुनत कहप मन मुस्काना ।
भई स ाय सारद मैंजाना ।।
जातुधान सुहन रावन बचना ।
लागेंरचेम ढ सोई रचना ।।
र ा न नगर बसन घृत तेला ।
बाढी प िंछ कीन्ह कहप खेला ।।
कौतुक क आए पुरवासी ।
मारह िंचरन करह िं बहु ािंसी ।।
बाजह िं ढोल देह िं सब तारी ।
नगर िे री पुहन प ँछ प्रजारी ।।
पावक जरत देच्छख नुमिंता ।
भयउ परम लघुरूप तुरिंता ।।
हनबुकुचढेउ कहप कनक अटारी ।
भई सभीत हनशाचर नारी ।।
[ दो ा २५ ] सुंदरकांड

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रर प्रेररत तेह अवसर चलेमरूत उन्चास ।
अट्टा ास करर गरजा कहप बहढ लाग अकास ।।
दे हवशाल परम रु आई ।
मिंहदर तेमिंहदर चढ़ धायी ।।
जरई नगर भा लोग हब ाला ।
झपट लपट बहु कोहट कराला ।।
तात मातु ा सुहनअ पुकारा ।
एह िं अवसर को मह उबारा ।।
म जो क ा य कहप न ीिं ोई ।
बानर रूप धरेसुर कोई ।।
साधुअवज्ञा कर िलुऐसा ।
जरई नगर अनार् कर जैसा ।।
जारा नगरू हनहमष एक मा ीिं।
एक हवभीषण कर गृ ना ी ।।
ता द त अनल जेह हसरजा ।
जरा न सो तेह कारन हगररजा ।।
उलटी पलटी लिंका सब जारी ।
क हद परा पुहन हसिंधुमिंझारी ।।
[ दो ा २६ ] सुंदरकांड

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प िंछ बुझाई खोई श्रम धरर लघुरूप ब ोरी ।
जनकसुिंता के आगेिाढ़ भयउ करर जोरी ।।
मातुमोह दीजेकछुचीन ा ।
जैसेरघुनायक मोह दीन्हा ।।
च डामहन उतारी तब दयउ ।
षथसमेत पवनसुत लयउ ।।
क ेह तात अस मोर प्रनामा ।
सब प्रकार प्रभुप रन कामा ।।
दीन दयाल हबरदुसिंभारर ।
रहु नार् मम सिंकट भारी ।।
तात सक्रसुत कर्ा सुनाएहु ।
बान प्रताप प्रभ ी समुझाएहु ।।
मास हदवस महुँनार् नार्ुन आवा ।
तौ पुहन मोह हजअत न ीिंपावा ।।
कहिं कहप के ी हवहध राखौ प्राना ।
तुम्हह तात क त अब जाना ।।
तो ी देच्छख सीतहल भई छाती ।
पुहन मो कहुिं सोई हदनुसो राती ।।
[ दो ा २७ ] सुंदरकांड

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जनकस ताह सम झाई करर बहु हवहध धीरजुदीन्ह ।
चरन कमल हसरू नाई कहप गवनुराम पह िं कीन्ह ।।
चलत म ाधुहन गजेसी भारी ।
गभथस्त्रह िं सुहन हनष्चर नारर ।।
नाहघ हसिंधुऐ ी पारह आवा ।
सबद हकलहकला कहपन्ह सुनावा ।।
षेसब बीलोकी नुमाना ।
न तन जन्म कहपन्ह तब जाना ।।
मुख प्रशन्नन तन तेज हबराजा ।
हकन्हेहस रामचन्द्र कर काजा ।।
हमलेसकल अहत भय सुखारी ।
तलित मीन पाव हजहम बारी ।।
चले षी रघुनायक पासा ।
प छत क त नवल इहत ासा ।।
तब मधुबन भीतर सब आए ।
अिंगद सिंमत मधुिल खाए ।।
रखवारेजब बरजन लागे।
मुष्टी प्र ार नत सब भागे।।
[ दो ा २८ ] सुंदरकांड]

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जाइ पुकारेतेसब बन उजार जुबराज ।
सुहन सुग्रीव षथकहप करर आए प्रभुकाज ।।
जौिं ोती सीता सुहध पाई ।
मधुबन के िल सकह िं की खाई ।।
ए ी हवहध कर हवचार कर राजा ।
आइ गए कहप सह त समाजा ।।
आई सबच्छन्ह नावा पद सीसा ।
हमलेउ सबच्छन्ह अहत प्रेम कपीसा ।।
प छी कु सल कु सल पद देखी ।
राम कृ पा भा काजुहबसेषी ।।
नार् काजुकीन्हेउ नुमाना ।
राखेसकल कहपन्ह के प्राना ।।
सुहन सुग्रीव बहुरर तेह हमलेउ ।
कहपन्ह सह त रघुपहत पह िं चलेउ ।।
राम कहपन्ह जब आवत देखा ।
हकएँकाजुमन षथहवशेषा ।।
िहटक हसला बैिेदौ भाई ।
परेसकल कहप चरच्छन्हिं जाई ।।
[ दो ा २९ ] सुंदरकांड]
प्रीहत सह त सब भेटेंरघुपहत करुणा पुिंज ।
प ँछी कु सल नार् अब कु सल देच्छख पद किं ज ।।
जामविंत क सुनुरघुराया ।
जा पर नार् करहु तुम दाया ।।
ताह सदा सुभ कु सल हनरिंतर ।
सुर नर मुहन प्रनन्न त ऊपर ।।
सोई हबजई हबनई गुन सागर ।
तासुसुजसुहिलोक उजागर ।।
प्रभुकी कृ पा भयउ सबुकाज ।
जन्म मार सुिल भा आज ।।
नार् पवनसुत कीच्छन्ह जो करनी ।
स सहुँमुख न जाई सो बरनी ।।
पवनतनय के चररत सु ाए ।
जामविंत रघुपहतह सुनाए ।।
सुनत कृ पाहनहध मन अहत भाए ।
पुहन नुमान षी ह य लाए ।।
क हु तात के ी भाँहत जानकी ।
र ती करती रिा स्वप्रान की ।।
[ दो ा ३० ] सुंदरकांड]

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नाम पा रू हदवस हनहस, ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन हनज पद जिंहित जाह िं प्रान के ी बािंट ।।
चलत मोह च डामहन दीन्ही ।
रघुपहत हृदय लाई सोई लीन्ही ।।
नार् जुगल लोचन भरी बारी ।
बचन क ेकछुजनक कु मारी ।।
अनुज समेत ग ेह प्रभुचरना ।
दीनबिंधुप्रिंतारहत रना ।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी ।
के ी अपराध नार् ौ त्यागी ।।
अवगुन एक मोर मैंमाना ।
हबछु रत प्रान न कीन पयाना ।।
नार् सो नयच्छन्ह को अपराधा ।
हनसरत प्रान करर िी बाधा ।।
हबर अहि तनुत ल समीरा ।
स्वास जरइ छन मारर शरीरा ।।
नयन स्त्रवह िं जलुहनज ह त लागी ।
जरैंन पाव दे हबर ागी ।।
सीता कै अहत हबपती हबसाला ।
हबनह िं क ेंभहल दीन दयाला ।।
[ दो ा ३१ ] सुंदरकांड]

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हनहमष हनहमष करुणाहनहध जाह कलप सम बीहत ।
बेगी चलेउ प्रभुआहनअ भुज बल खल दल जीहत ।।
सुहन सीता दुख प्रभुसुख अयना ।
भरर आए जल राहजव नैना ।।
बचन काएँमन मम गहत जा ी ।
सपनेहँब हझअ हबपहत की ताह ।।
क नुमिंत हबपहत प्रभुसोई ।
जब तव सुहमरन भजन न ोई ।।
के हतक बात प्रभुजातुधान की ।
रीपु ी जीहत आहनबी जानकी ।।
सुनुकहप तो ी समान उपकारी ।
न ीिंकोउ सुर नर मुहन तनुधारी ।।
प्रहत उपकार करौिंका तोरा ।
सनमुख ोई न सकत मन मोरा ।।
सुनुसुत तो ी उररन मैंना ी ।
देखेउँकरर हवचार कर मा ीिं।।
पुहन पुहन कहपह हचतव सुरिाता ।
लोचन नीर पुलक अहत गाता ।।
[ दो ा ३२ ] सुंदरकांड]

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सुहन प्रभुवचन हबकोहक मुख गात षी नुमिंत ।
चरन परेउ प्रेमाकु ल िाह िाह भगविंत ।।
बार बार प्रभुच इ उिावा ।
प्रेम मगन तेह उिब न भावा ।।
प्रभुकर पिंकज कहप के सीसा ।
सुहमरर सो दसा मगन गौरीसा ।।
सावधान मन करर पुहन सिंकर ।
लागेक न कर्ा अहत सुिंदर ।।
कहप उिाई प्रभुहृदयँलगावा ।
कर गह परम हनकट बैिावा ।।
कहु कहप रावन पाहलत लिंका ।
के ी हवहध द ेउ अहत बिंका ।।
प्रभुप्रसन्न जाना नुमाना ।
बोला वचन हबगत अहभमाना ।।
सखामृग के बहड मनुसाई ।
साखा तेंसाखा पर जाई ।।
नाहघ हसिंधु ाटकपुर जारा ।
हनहसचर गन हवहध हबहपन उजारा ।।
सो सब तब प्रताप राघुराई ।
नार् न कछुमोरी प्रभताई ।।
[ दो ा ३३] सुंदरकांड]

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ता कहुँप्रभुकछुअगम न ीिंजा पर तुम्ह अनुक ल ।
तव प्रभावँबडवानलह जारी सकई खल त ल ।।
नार् भगहत अहत सुखदायनी ।
देहु कृ पा करर अनपायनी ।।
सुहन प्रभुपरम सरल कहप बानी ।
एवमम्तुतब क ेउ भवानी ।।
उमा राम सुभाऊ जेह जाना ।
ताह भजनुतहज भाव न आना ।।
य सिंवाद जासुउर आवा ।
रघुपहत चरन भगहत सोई पावा ।।
सुहन प्रभुबचन क ह िं कहप बृिंदा ।
जय जय जय कृ पाल सुखकिं दा ।।
तब रघुपहत कहपपहत ी बोलावा ।
क ा चलैंकर करहु बनावा ।।
अब हबलिंब के ीिंकारन कीजे।
तुरत कहपन्ह कहिंआयस दीजे।।
कौतुक देच्छख सुमन बहु बरषी ।
नभ तेंभवन चलेसुर रषी ।।
[ दो ा ३४ ] सुंदरकांड]

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कहपपहत बेगी बोलाए आए ज र्प ज र् ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालुबरुर् ।।
प्रभुपद पिंकज नावह िं सीशा ।
गरह िं भाल म ाबल कीसा ।।
देखी राम सकल कहप सेना ।
हचतई कृ पा करर राहजव नैना ।।
राम कृ पा बल पाई कहपिंदा ।
भए पछजुत मनहुँहगररिंदा ।।
रहष राम तब कीन्ह पयाना ।
सगुन भए सुिंदर शुभ नाना ।।
जासुसकल मिंगलमय कीती ।
तासुपयान सगुन य नीहत ।।
प्रभुपयान जाना बैदे ीिं।
िरहक बाम अिंग जनुक ीिंदे ी।।
जोई जोई सगुन जाहनकी ी ोई ।
असगुन भयउ रावनह सोई ।।
चला कटकुको बरनैपारा ।
गजथह बानर भालुअपारा ।
नख आयुध हगरर पादपधारी ।।
चलेगगन मह इिाचारी ।
के ररनाद भालुकहप कर ीिं।
डगमगाह िं हदग्गज हचक्कर ीिं।।
।। छां द ।। सुंदरकांड

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कचक्करकहांकदग्गज डोल मकह किरर
लोल सािर खर भरे।
मन हरष सब िांदभभसुर मुकन
नाि ककन्नर दुख टरे।।
कटकटकहांमकभ ट कबकट भट
बहु कोकट कोकटन्ह धावही ां।
जय राम प्रबल प्रताप
कोसलनाथ िुन िन िावकहां ।।१ ।।
सकह सक न भार उदार अकहपकत
बार बारकहांमोहई ।
िह दसन पुकन पुकन कमठ पृष्ठ कठोर सो कककम सोहई ।।
रघुबीर रुकचर प्रयान प्रस्थकत जाकन परम सुहावनी ।
जनुकपठ खरपर सपभराज़ सो कलखत अकबचल पावनी ।। २।।
[ दो ा ३५ ] सुंदरकांड

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एह हवहध जाई कृ पाहनहध उतरेसागर तीर ।
ज ँत ँलागेखान िल भालुहबपुल कहप बीर ।।
उ ािं हनशाचर र ह िं ससिंका ।
तब तेंजारर गयउ कहप लिंका ।।
हनज हनज गृ ँसब कररह हबचारा ।
नह िं हनहसहचर कु ल के र उबारा ।।
जासुद त बल बरनी न जाई ।
तेह आए पुर कवन भलाई ।।
द हतन्ह सन सुहन पुरजन बानी ।
मिंदोदरी अहधक अकु लानी ।।
र हस जोरी कर पहत पग लागी ।
बोहल बचन नीहत रस पागी ।।
किं त करष रर सन परर रह ।
मोर खात अहत ह त ह यँधरह ।।
समझुत जासुद त कइ करनी ।
स्त्रवह िं गभथरचनीचर घरनी ।।
तासुनारी हनज सहचव बोलाई ।
पिवहुँकिं त जो च हु भलाई ।।
तव कु ल कमल हबहपन दुखदाई ।
सीता सीत हनसा सम आई ।।
सुनहु नार् सीता हबनुदीन्हें।
ह त न तुम्हार सिंभुअज कीन्हें।।
[ दो ा ३६ ] सुंदरकांड]

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राम बान अह गन सररस हनकर हनसाचर भेक ।
जब लगी ग्रस्त न तब लगी जतनुकरहु तहज टेक ।।
श्रवण सुहन सि ता करर बानी ।
हब सा जगत हबहदत अहभमानी ।।
सभय सुभाउ नारी कर साचा ।
मिंगल महिंाँभय मन अहत काचा ।।
जौिंआवई मरकट कटकाई ।
हजअह िं हबचारेहनहसचर खाई ।।
कहपह िं लोकप जाकी िासा ।
तासुनारी सभीत बडी ासा ।।
अस क ी हब हस ताह उर लाई ।
चलेउ सभाँममता अहधकाई ।।
मिंदोदरी हृदय कर हचिंता ।
भयउ किं त पर हवहध हवपरीता ।।
बिै उ सभाँखबरर असी पाई ।
हसिंधुपार सेना सब आई ।।
बुझेहस सहचव उहचत मत क ह ।
तेसब िंसेमष्ट करर र ह ।।
हजतेहु सुरासर तब श्रम ना ी ।
नर वानर के ी लेखेमा ीिं।।
[ दो ा ३७ ] सुंदरकांड]

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सहचव बैंदेगुर तीहन ज्ोिंहप्रय बोलाह िं भय आस ।
राज धमथतन तीहन कर ो ीिंबेग ी नास ।।
सोई रावन कहुिं बनी स ाई ।
अस्तुहत करहुिं सुनाई सुनाई ।।
अवसर जाहन हवभीषनुआवा ।
भ्राता चरन सीसुतें ी नावा ।।
पुहन सुरु नाई बैि हनज आसन ।
बोला बचन पाई अनुशासन ।।
जौ कृ पाल प हछहँमोह बाता ।
महत अनुरूप का ौ ह त ताता ।।
जो आपन चा ैकल्याना ।
सुजसुसुमहत सुभ गहत सुख नाना ।।
सो परनारी हललार गोसाईिं ।
तजउ चउहर् के चिंद के नाई ।।
चौद भवन एक पहत ोई ।
भ त द्रो हतष्टई न ीिंसोई ।।
गुन सागर नागर नर जोऊ ।
अलप लोभ भल क ई न कोऊ ।।
[ दो ा ३८ ] सुंदरकांड]

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काम क्रोध मद लोभ सब , नार् नरक के पिंर् ।
सब परर रर रघुबीरह भजहु भजह िं जेह सिंत ।।
तात राम न ीिंनर भ पाला ।
भुवनेश्वर कालहु कर काला ।।
ब्रम्ह अनामाय अज भगवन्ता ।
ब्यपाक अहजत अनाहद अनिंता ।।
गौ हिज धेनुदेव ह तकारी ।
कृ पा हसिंधुमानुष तनुधारी ।।
जन रिंजन भिंजन खल ब्राता ।
वेद धमथरकछक सुन िं भ्राता ।।
ताह बयरू ताहज नाइअ मार्ा ।
प्रनतारहत भिंजन रघुनार्ा ।।
देहु नार् प्रभुकहिं बैदे ी ।
भजहु राम हबनु ेतुसने ी ।।
सरन गएँप्रभुताहु न त्यागा ।
हबस्व द्रो कृ त अघ जेह लागा ।।
जासुनाम िय ताप नसावन ।
सोई प्रभुप्रकट समुझुहजय रावन ।।
[ दो ा ३९ ] सुंदरकांड

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बार बार पद लागउँहबनय करूिं दससीस ।
परर रर मान मो मद भजहु कोसलाधीश ।।
मुहन पुलच्छस्त हनज हशष्य सन कह पिई य बात ।
तुरत सो मैंप्रभुसन क ी पाई सुअवसर तात ।।
माल्विंत अहत सहचव सयाना ।
तासुवचन सुहन अहत सुख माना ।।
तात अनुज तव नीहत हवभ षन ।
सो उर धरह जो क त हवभीषण ।।
ररपुउतकरष क त सि दोऊ ।
द री न करहिं इन्हा इ कोऊ ।।
माल्यविंत गृ गयउ ब ोरी ।
क इ हवभीषनुपुहन कर जोरी ।।
सुमहत कु महत सब के उर र ीिं।
नार् पुरान हनगम अस क ी ।।
ज ािं सुमहत त ँसिंपहि नाना ।
त ािं कु महत तँ हवपहत हनदाना ।।
तव उर कु महत बसी हवपरीता ।
ह त अनह त मानह ररपुप्रीता ।।
कालराहत हनहसचर कु ल के री ।
तेह सीता पर प्रीहत घनेरी ।।
[ दो ा ४० ] सुंदरकांड
तात चरन गह मागहुँराखहु मोर दुलार ।
सीता देहु राम कहु अह त ोई तुम्हार ।।
बुध पुरान श्रुहत सिंमत बानी ।
क ी हवभीषण नीहत बखानी ।।
सुनत दसानन उिा ररसाई ।
खल तोह हनकट मृत्युअब आई ।।
हजअहस सदा सि मोर हजआवा ।
ररपुकर पक्छ म ढ़ तोह भावा ।।
क हस खल अस को जग मा ीिं।
भुज बल जाह हजता मैना ी ।।
मम पुर बहस तपहसन्ह पर प्रीहत ।
सि हमलुजाइ हतच्छन्ह कहु नीहत ।।
अस काह कीन्हेहस चरन प्र ारा ।
अनुज ग ेपद बारह बारा ।।
उमा सिंत कइ इ इ बडाई ।
मिंद करत जो करई भलाई ।।
तुम्ह हपतुसररस भलेह िंमोह मारा ।
रामुभजेह त नार् तुम्हारा ।।
सहचव सिंग लैनभ पर् गयउ ।
सबह सुनाई क त अस भयउ ।।
[ दो ा ४१ ] सुंदरकांड

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रामुसत्यसिंकल्प प्रभुसभा कालबस तोरी ।
मैंरघुबीर सरन अब जाउँदेहु जहन खोरी ।।
अस क ी चला हवभीषनुजब ीिं।
आय ीन भय सब तब ीिं।।
साधुअवगया तुरत भवानी ।
कर कल्याण अच्छखल कै ानी ।।
रावन जबह िं हवभीषण त्यागा ।
भयउ हबभव हबनुतबह िं अभागा ।।
चलेउ रहष रचुनायक पा ी ।
करत मनोरर् बहु मन मा ीिं।।
देच्छख उँजाइ चरन जलजाता ।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ।।
जेपद परसी तरी ररषीनारी ।
दिंडक कानन पावक कारी ।।
जेपद जनकसुताँउर लाए ।
कपट कु रिंग सिंग धर धाएिं ।।
र उर सर सरोज पद जेई ।
अ ोभाग्य मैंदेच्छख उँतेई ।।
[ दो ा ४२ ] सुंदरकांड

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हजन्ह पायन्ह के पादुकच्छन्हिं भरतुर ेमन लाई ।
तेपद आजुहबकोकीह उँइिंन्ह नयच्छन्हिं अब जाई ।।
एह हवहध करत सप्रेम हबचारा ।
आयउ सपहद हसिंधुएह िं पारा ।।
कहपन्ह हबभीषनुआवत देखा ।
जाना कोउ ररप द त हवसेषा ।।
ताह राखी कपीस प ी आए ।
समाचार सब ताह सुनाए ।।
क सुग्रीव सुनहु रघुराई ।
आवा हमलन दसानन भाई ।।
क प्रभुसखा बुझे ेका ा ।
क इ कपीश सुनहु नरना ा ।।
जाहन न जाई हनशाचर माया ।
कामरूप के ी कारन आया ।।
भेद मार लेन सि आवा ।
राच्छखअ बािंधी मोह अस भावा ।।
सखा नीहत तुम्ह नीहक हबचारी ।
मम पन सरनागत भय ारी ।।
सुहन प्रभुबचन रष नुमाना ।
सरनागत बछछ्ल भगवाना ।।
[ दो ा ४३ ] सुंदरकांड
सरनागत कहिं जेतजह िं हनज अनह त अन माहन ।
तेनर पावँर पापमय हतन्हह हबलोकत ाहन ।।
कोहट हवप्र बध लागह िं जाह ।
आएँसरन तजउँनह िं ताह ।।
सनमुख ोई जीव मोह जब ी ।
जन्म कोहट अब नासह िं तबह िं ।।
पापविंत कर स ज स भाऊ ।
भजनुमोर तेह भाव न काऊ ।।
जौिंपैदुष्ट हृदय सोई ोई ।
मोरेसनमुख आव हक सोई ।।
हनमथल मन जन सो मोह पावा ।
मोह कपट छल हछद्र न भावा ।।
भेद लेन पिवा दससीसा ।
तबहुँन कछुभय ाहन कपीसा ।।
जग महुँसखा नीसाचर जेते।
लहछमनु नई हनहमष महुँतेते।।
जौिंसभीत आवा सरनाई ।
रच्छख उँताह प्रान हक नाई ।।
[ दो ा ४४ ] सुंदरकांड

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उभय भािंहत तेह आनहु िंसी क कृ पा हनकत ।
जय कृ पाल क ी कहप चलेअिंगद न समेत ।।
सादर तेह आगेकरर बानर ।
चलेज ािं रघुपहत करुनाकर ।।
दुरर ी तेदेखेदौ भ्राता ।
नयनानिंद दान के दाता ।।
बहुरर राम छहब धाम बीलोकी ।
र ेउ िटुहक एकटक पल रोकी ।।
भुज प्रलिंब किं जारुन लोचन ।
स्यामत गात प्रनत भय मोचन ।।
हसिंध किं ध आयत उर सो ा ।
आनन अहमत मदन मन मो ा ।।
नयन नीर पुलहकत अहत गाता ।
मन धरर धीर क ी मृदुबाता ।।
नार् दशानन कर मैंभ्राता ।
हनहसचर बिंस जन्म सुरिाता ।।
स ज पापहप्रय तामस दे ा ।
जर्ा उल कह तम पर ने ा ।।
[ दो ा ४५ ] सुंदरकांड

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श्रवण सुजस सुहन आयउँ, प्रभुभिंजन भव भीर ।
िाह िाह आरती रन , सरन सुखद रघुबीर ।।
अस क ी क त दिंडवत देखा ।
तुरत उिेप्रभु रत हबसेषा ।।
दीन बचन सुहन प्रभुमन भावा ।
भुज हबसाल गह हृदयँलगावा ।।
अनुज समेत हमहल हढग बैिारी ।
बोलेवचन भगत भय ारी ।।
कहु लिंके श सह त पररवारा ।
कु सल कु िा ार बास तुम्हारा ।।
खल मिंडली बसहु हदनुराती ।
सखा धमथहनबई के ी भािंहत ।।
मैंजानुतुम्हारी सब रीहत ।
अहत नय हनपुन न भाव अनीहत ।।
बरु भल बास नरक कर ताता ।
दुष्ट सिंग जहन देई हवधाता ।।
अब पद देच्छख कु शल रघुराया ।
जौ तुम्ह कीच्छन्ह जाहन जन दाया ।।
[ दो ा ४६ ] सुंदरकांड

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तब लगी कु शल न जीिंव कहिं सपेनेह मन हवश्राम ।
जब लगी भजत न राम कहिं सोक धाम तहज काम ।।
जब लगी हृदय बसत खल नाना ।
लोभ मो मिर मद माना ।।
जब लगी उर न बसत रघुनार्ा ।
धरेंचाप सायक कटी भार्ा ।।
ममता तरुण तमी अिंहधयारी ।
राग िेष उल क सुखकारी ।
जब लगी बसती जीव मन मा ी ।
जब लगी प्रभुप्रताप रहव ना ी ।।
अब मैंकु शल हमटेभय भारे।
देच्छख राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृ पाल जा पर अनुकला ।
ताह न ब्याप हिहबध भव स ला ।।
मैंहनहसचर अहत अधम सुभाउ ।
शुभ आचरनुकीन्ह न ीिंकाऊ ।।
जासुरूप मुहन ध्यान न आवा ।
तेह प्रभु ररहष हृदयँमोह लावा ।।
[ दो ा ४७ ] सुंदरकांड

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अ ोभाग्य मम अहमत अहत राम कृ पा सुख पुिंज ।
देखेउँनयन हबरँहच हसव सेब्य जुगल पद किं ज ।।
सुनहु सखा हनज क उँसुभाउ ।
जान भुसुिंहड सिंभुहगरजाऊ ।।
जौ नर ोइ चराचर द्रो ी ।
आवैसभय सरन तहक मो ी ।।
तहज मद मो कपट छल नाना ।
करउँसघ तेह साधुसमाना ।।
जननी जनक बिंधुसुत दारा ।
तनुधनुभवन सुहृदय पररवारा ।।
सब कैममता ताग बटोरी ।
मम पद मन ी बािंध बरी डोरी ।।
समदरसी इिा कछुना ी ।
रष सोक भय न ीिंमन मा ीिं।।
अस सज्जन मम उर बस कै से।
लोभी हृदय बसई धनुजैसे।।
तुम्ह साररखेसिंत हप्रय मोरे।
धरउँदे न ीिंआन हन ारें।।
[ दो ा ४८ ] सुंदरकांड

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सगुन उपासक परह त हनररत नीहत दृढ़ नेम ।
तेरेनर प्रान समान मम हजन्ह केहिज पद प्रेम ।।
सुनुलिंके श सकल गुन तोरें।
तातेंतुम अहतसय हप्रय मोरे।।
राम बचन सुहन वानर ज र्ा ।
सकल कह िं जय कृ पा बरूर्ा ।।
सुनत हबभीषनुप्रभुकैबानी ।
न ीिंअघात श्रवनामृत जाहन ।।
पद अिंबुज गह बार ी बारा ।
ह्रदयँसमात न प्रमुअपारा ।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी ।
प्रनतपाल उर अिंतरजामी ।।
उर कछुप्रर्म बसना र ी ।
प्रभुपद प्रीहत सररत सो ब ी ।।
अब कृ पाल हनज भगहत पावनी ।
देहु सदा हशव मन भावनी ।।
एवमस्तुक ी प्रभुरिंनधीरा ।
मागा तुरत हसिंधुकर नीरा ।।
जदहप सखा तब इक्छा ना ी ।
मोर दरसुअमोघ जग मा ीिं।।
अस क ी राम हतलक तेह सारा ।
सुमन बृहष्ट नभ भई अपारा ।।
[ दो ा ४९ ] सुंदरकांड

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रावन क्रोध अनल हनज स्वास समीर प्रचिंड ।
जरत हवभीषनुराखेउ दीन्हेउ राजुअखिंड ।।
जो सिंपहत हशव रावनह दीच्छन्ह हदए दस मार् ।
सोइ सम्पदा हवभीषणह सकु ची दीच्छन्ह रघुनार् ।।
अस प्रभुछाडी भजह िं जेआना ।
तेनर पसुहबनुप िंछ हबषाना ।।
हनज जन जाहन ताह अपनावा ।
प्रभुसुभाव कहप कु ल मन भावा ।।
पुहन सबथग्य सबथउर बासी ।
सबथरूप सब रह त उदासी ।।
बोलेबचन नीहत प्रहतपालक ।
कारन मनुज दनुज कु ल घालक ।।
सुनुकपीश लिंका पहतबीरा ।
के ी हवहध तररअ जलहध गिंभीरा ।।
सिंकु ल मकर उरग झस जाती ।
अहत अगाध दुस्तर सब भािंहत ।।
क लिंके श सुनह रघुनायक ।
कोहट हसिंधुसोषक तव सायक ।।
जधहप तदहप नीहत अहस गाई ।
हबनय कररउ सागर सन जाई ।।
[ दो ा ५० ] सुंदरकांड
प्रभुतुम्हार कु ल गुरु जलधी , कह ी उपाय हबचारी ।
हबनुप्रयास सागर तररह सकल भाल कहप धारी ।।
सखा क ी तुम नीकी उपाई ।
कररअ देव जौ ोई स ाई ।।
मिंि न य लहछमन मन भावा ।
राम बचन सुहन अहत दुख पावा ।।
नार् दैव कर कवन भरोसा ।
सोहषअ हसिंधुकररअ मन रोसा ।।
कादर मन कहिं एक आधारा ।
दैव दैव आलसी पुकारा ।।
सुनत हब सी बोलेरघुबीरा ।
एसे ी करब धरहु मन धीरा ।।
अस क ी प्रभुअनुजह िं सामुझाई ।
हसिंधुसमीप गए रघुराई ।।
प्रर्म प्रनाम कीन्ह हसरू नाई ।
बैिेपुहन तट दभथडसाई ।।
जबह िं हवभीषण प्रभुप ी आए ।
पाछेरावन द त पिाए ।।
[ दो ा ५१ ] सुंदरकांड

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सकल चररत हतन्ह देखेंधरेकपट कहप दे ।
प्रभुगुन हृदयँसरा ह िं सरनागत पर ने ।।
प्रकट बखानह िं राम सुभाउ ।
अहत सप्रेम गा हबसरी दोराऊ ।।
ररप के द त कहपन्ह तब जाने।
सकल बािंहध कपीश पह िंआने।।
क सुग्रीव सुनहु सब वानर ।
अिंग भिंग करर पिहु हनहसचर ।।
सुहन सुग्रीव बचन कहप धाएिं ।
बािंधी कटक चहु पास हिराए ।।
बहु प्रकार मारन कहप लागे।
दीन पुकारत तदहप न त्यागें।।
जो मार र नासा काना ।
तेह कौसलाधीस कैआना ।।
सुहन लक्ष्मण सब हनकट बोलाए ।
दया लागी िंसी तुरत छु डाए ।।
रावन कर दीजहु य पाती ।
लक्ष्मण बचन बाचुकु ल घाती ।।
[ दो ा ५२ ] सुंदरकांड
क ेह मुखागर म ढ सन मम सिंदेस उदार ।
सीता देई हमलहु न त आवा कालुतुम्हार ।।
तुरत लाई लहछमन पद मार्ा ।
चलेद त बरनत गुन गार्ा ।।
क त राम जसुलिंका आए ।
रावन चरन सीस हतन नाएिं ।।
हब हस दशानन प छी बाता ।
क हस न सुक आपहन कु स लाता ।।
पुहन कहु खबरी हवभीषण के री ।
जाह मृत्युआई अहत नेरी ।।
करत राज लिंका सि त्यागी ।
ोइह जब कर कीट अभागी ।।
पुहन कहिं भाल कीस कटकाई ।
कहिन कराल प्रेररत चली आई ।।
जीन के जीवन कर रखवारा ।
भयउ मृदुल हचत हसिंधुहबचारा ।।
कहिं तपहसच्छन्ह कै बात ब ोरी ।
हजन के ह्रदय िास अहत मोरी ।।
[ दो ा ५३ ] सुंदरकांड

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की भई भेंट की हिर गए श्रवन सुजसुसुहन मोर ।
क हस न ररपुदल तेज बल बहुत चहकत हचत तोर ।।
नार् कृ पा करी प छे हु जैसे।
मानहु क ा क्रोध तहज तैसे।।
हमला जाइ जब अनुज तुम्हरा ।
जातह िं राम हतलक तेह सारा ।।
रावन द त मह िं सुहन काना ।
कहपच्छन्ह बािंधी दीन ेदुख नाना ।।
श्रवण नाहसका काटेलागे।
राम सपर् दीन्हे म त्यागें।।
प छीहुँनार् राम कटकायी ।
बदन कोहट सत बररनी न जाई ।।
नाना बरन भाल कहप धारी ।
हबकटानन हवशाल भयकारी ।।
जेह िं पुर द ेउ तेउ सुत तोरा ।
सकल कहपच्छन्ह म ँतेह बल र्ोरा ।।
अहमत नाम भट कहिन कराला ।
अहमत नाम बल हबपुल हबसाला ।।
[ दो ा ५४ ] सुंदरकांड

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हिहवद मयिंद नील नल अिंगद गद हबकटाहस ।
दहधमुख के रर हनसि सि जामविंत बहलराहस ।।
ए कहप सब सुग्रीव समाना ।
इन्ह सम कोहटन्ह गनई को नाना ।।
राम कृ पा अतुहलत बल हतनच्छन्ह ।
तृन समान हिलोकह गन ी ।।
अस मैंसुना श्रवण दसकिं धर ।
पदुम अिार ज र्प बिंदर ।।
नार् कटक म ँसो कहप ना ी ।
जो न तुम ह जीतैरन मा ीिं।।
परम क्रोध मीजह सब ार्ा ।
आयसुपैन देह िं रघुनार्ा ।।
सोषह िं हसिंधुसह त झष ब्याला ।
पुर ी न त भरी कु धर हबसाला ।।
मदी गदथहमलवह िं दससीसा ।
ऐसेई बचन क ह िं सब कीसा ।।
गजथह िं तजथह िं स ज असिंका ।
मानहुँग्रसन च त ह िं लिंका ।।
[ दो ा ५५ ] सुंदरकांड

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स ज स र कहप भाल सब पुहन हसर पर प्रभुराम।
रावन काल कोहट कहिं जीती सकइ सिंग्राम ।।
राम तेज बल बुच्छि हवपुलाई ।
सेष स त सत सकह िं न गाई ।।
सक सर एक सोषी सत सागर ।
तव भ्रातह िं प िंछउ नय नागर ।।
तासुवचन सुहन सागर पा ी ।
मागत पिंर् कृ पा मन मा ीिं।।
सुनत बचन हब सा दससीसा ।
जौिंअहस मती स ाय कृ त कीसा ।।
स ज भीरू कर बचन दृढाई ।
सागर सन िानी मचलाई ।।
म ढ़ मृशा का कररष बडाई ।
ररप बल बुच्छि र्ा र मैपाई ।।
सहचव सभीत हवभीषण जाके ।
हवजय हवभ हत क ािं जग तािंके ।।
सुहन खल बचन द त ररहस बाढी ।
समय हबचारी पहिका काढी ।।
रामानुज दीन्ही य पाती ।
नार् बचाई जुडाबह छाती ।।
हब सी राम कर लीन ी रावन ।
सहचव बोहल सि लाग बचावन ।।
[ दो ा ५६ ] सुंदरकांड

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बातन्ह मनह ररझाई सि , जहन घालसी कु ल खीस ।
राम हवरोध न उबरसी सरन हवष्णुअज ईस ।।
की ताजी मान अनुज इव प्रभुपद पिंकज भृिंग ।
ो ी हक राम सरानल खल कु ल सह त पतिंग ।।
सुनत सभय मन मुख मुसकाई ।
क त दसानन सबह सुनाई ।।
भ हम परा कर ग त अकासा ।
लघुतापस कर बाग हबलासा ।।
क सुक नार् सत्य सब बानी ।
समझहु छाडी प्रकृ हत अहभमानी ।।
सुनह बचन मम परर रर क्रोधा ।
नार् राम सन तजहु हवरोधा ।।
अहत कोमल रघुबीर सुभाऊ ।
जधहप अच्छखल लोक कर राऊ ।।
हमलत कृ पा तुम्ह पर प्रभुकरर ी ।
उर अपराध न एकउ धरर ी ।।
जनकसुता रघुनार्ह दीजै।
एतना क ा मोर प्रभुकीजे।।
जब तेह क ा देन बैदे ी ।
चरन प्र ार कीन सि तेह ।।
नाई चरन हसरू चला सो त ािं ।
कृ पाहसिंधुरघुनायक ज ािं ।।
करर प्रनामुहनज कर्ा सुनाई ।
राम कृ पा आपनी गहत पाई ।।
ररषी अगच्छस्त की सािंप भवानी ।
राक्षस भयउ र ा मुहन ग्याहन ।।
बिंदी राम पद बाराह बारा ।
मुहन हनज आश्रम कहिं पग धारा ।।
[ दोहा ५७ ] सुंदरकांड
कवनय न मानत जलकध जड़ , िए तीनी कदन बीती ।
बोलेराम सकोप तब भय कबनुहोय न प्रीकत ।।
लहछमन बान सरासन आन ।
सोषो बाररहध हबहसख कृ सानु।।
सि सन हबनय कु हटल सन प्रीहत ।
स ज कृ पन सन सुिंदर नीहत ।।
ममता रत सन ग्यान क ानी ।
अहत लोभी सन हबरहत बखानी ।।
क्रोधह सम काहमह ररकर्ा ।
ऊसर बीज बएँिल जर्ा ।।
अस क ी रघुपहत चाप चढावा ।
य मत लहछमन के मन भावा ।।
सिंधानेउ प्रभुबीहसख कराला ।
उिी उदहध उर अिंतर ज्वाला ।।
मकर उरग झष गन अकु लाने।
जरत जिंतुजलनीधी जब जाने।।
कनक र्ार भरी मनी गन नाना ।
हबप्र रूप आयउ तहज माना ।।
[ दो ा ५८ ] सुंदरकांड
कातेह िं पइ कदरी िरइ कोहट जतन कोउ सीिंच ।
हवनय न मान खगेस सुनुडाटेह िं पई नव नीच ।।
सभय हसिंधुगई पद प्रभुके रे।
छमहु नार् सब अवगुण मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी ।
इन्ह क ीिंनार् स ज जड करनी ।।
तव प्रेररत माया उपजाए ।
सृहष्ट ेतुसब ग्रिंर्हन गाए । ।
प्रभुआयसुजेह क जस अ इ ।
सो तेह भािंहत र ेंसुख ल ई।।
प्रभुभल कीन्ह मोह हसख दीन्ही ।
मरजादा पुहन तुम्हरी कीन ी ।।
ढोल गवार श द्र पशुनारी ।
सकल ताडना के अहधकारी ।।
प्रभुप्रताप मैजाब सुखाई ।
उतरर ी कटक न मोरी बडाई ।।
प्रभुअग्या अपेल श्रुहत गाई ।
करौ सो बेगी जो तुम ह िं सो ाई ।।
[ दो ा ५९ ] सुंदरकांड

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सुनत हबनीत बचन अहत क कृ पाल मुसुकाई ।
जेह हवहध उतरैकहप कटकुतात सो क हु उपाई ।।
नार् नील नल कहप िौ भाई ।
लररकाई ररषी आहसष पाई ।।
हतन्ह के परस हकएँहगरर भारे।
तरर ह िं जलहध प्रताप तुम्हारे।।
मैंपुहन उर धरर प्रभुप्रभ ताई ।
करर उँबल अनुमान स ाई ।।
एह हवहध नार् पयोधी बधाईअ ।
जेह िं य सुजसुलोक हतहुँगाइअ ।।
एह िं सर मम उिर तट बासी ।
तहु नार् खल नघ अघ रासी ।।
सुहन कृ पाल सागर मन पीरा ।
तुरतह िं री राम रनधीरा ।।
देच्छख राम बल पौरुष भारी ।
रहष पयोहनधी भयउ सुखारी ।।
सकल चररत क ी प्रभुह सुनावा ।
चरन बिंदी पार्ोधी हसधावा ।।

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।। छन्द ।।
कनज भवन िवनेउ कसांधुश्रीरघुपकतकह यह मत भायऊ ।
यह चररत ककल मलहर दास तुलसी िायऊ ।।
सुख भवन सांसय समन दमन कवषाद रघुपकत िुन िना ।
तकज सकल आस भरोस िावकह सुनकह सांतत सठ मना ।।
[ दो ा ६० ] सुंदरकांड
सकल सुमिंगल दायक रघ नायक गुनगान ।
सादर सनह िं तेतरह िं भव हसिंधुहबना जलजान ।।
इहत श्रीमद्रामचररतमानसेसकलकहलकलुषहवध्विंसनेपच्चम: सोपन: समाप्त:
( कहलयुग के समस्त पापोिंका नाश करनेवालेश्रीरामचररमानस का पािंचवािं सोपान समाप्त हुआ )

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( सुन्दरकाण्ड समाप्त )

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